संदेश

अप्रैल, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

शायरी#१

माना कि मुश्किल हालात में हूँ, पर खुश हूँ, किसी के जज्बात में हूँ।

जब कोरोना आया था!!

कभी मानव जाति पर, ऐसा वक्त भी आया था। बैठ गयी थी धूल, जिसे ठोकर से उड़ाया था। अपने कर्मो का उसने, शायद फल ये पाया था। बसंत के मौसम में, उसने मुँह अपना छुपाया था। जुबां हो गयी थी बन्द, बस आंखों ने फरमाया था। मानस को देख मानस ने, मुँह अपना पिचकाया था। हवा हो गयी थी साफ, फिर भी खुली सांस न ले पाया था। वुद्धिजीवी ने ही, खुद पर पवंदियाँ को लगाया था। भीड़ देख के आदम की, आदम घबराया था। बड़े कुट रहे थे वो, जिसने भी झुंड बनाया था। खुले उड़ रहे थे वो, जिन्हें पिंजरे में बसाया था। पैर होकर के भी, वो चौखट लांघ न पाया था। निर्मल हो गयी थी नदियां, जिनमें तेजाब मिलाया था। पेड़ों ने भी खुश होकर, अपने सिर को हिलाया था। अब दिख रहा था वो, जो कभी नजर न आया था। उठ गया था परदा, प्रकृति पे जो गिराया था। जिन्हें कोसते रात दिन, उन्होंने फ़र्ज़ अपना निभाया था। क्यो ईश्वर का है रूप दूसरा, डॉक्टर नर्सो ने दिखाया था। खामोश खड़ा था मैं, ज्यादा कुछ न कर पाया था। घर में रहने का शासनादेश, मैंने खूब निभाया था। तुम ऐसे याद करोगें, उस दिन को। जब कोरोना आया था।