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शायरी#४

दोस्त! कैसे समझता मै उसे, जब सिक्का मैंने पलटा ही नही, (जिंदगी) मै यहाँ इंतज़ार कर रहा हूँ, वो वहां इंतजार कर रही है। (म्रत्यु)

शायरी#3

वह गुजरा दौर था, जब पैरों को मिट्टी और मिट्टी को पैर चूमते थे। यह नया दौर है, यहाँ दो पैर भी मुखोटे पहन के घूमते हैं।।