पलायन
सुनहरी नगरी की ओर, जो बढ़ाये थे कदम, अब भूल बन गये है मेरी, जरूरत के बोझ तले, दब गए है सपने, आज फिर अहसास हुआ, मुझे उस खाली हाथ का। जिन्हें लेकर आया था मैं, बुनने को सपने, थक गए वो पैर, जो खुशी में दौड़े थे, स्वप्न धूमिल हो गए, राह ओझिल हो गयी, लील गयी सब उम्मीद, इस महामारी के दौर में, थक गया हूँ अब, न हो पायेगा। भूखा शरीर, आखिर कितना बोझ ढो पायेगा। दो चार कदम हों तो दौडूं मैं, पूरब का पश्चिम से मिलन, कैसे हो पायेगा। उम्मीद है बस, किसी तरह लौट जाउँ मैं, अपने उस प्यारे गांव में, बैठूंगा फिर कभी, किसी नीम की झाव में, इस बार देखूंगा ख़्वाब, हरियाली के अपने गाँव में, इस बार...