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शायरी#१४

 मेरी खुदगर्जी के चर्चे भी आजकल बहुत है, मैं उनसे ज्यादा आजकल खुद को देखता हूँ।

शायरी#१३

  द यार -ए-नूर देखा तो यक़ी आया। खुदा पर जुर्म ढाने के तरीके बहुत हैं।

शायरी#१२

  जब फोटो में तुम खड़ी नजर आई। नींद आने को थी नहीं आयी।

शायरी#११

  तारीफ़े करने में मुझे गुरेज नही हैं ख्वातीन। बशर्ते मैं उम्मीद पे खरा उतर जाऊं।

शायरी#१०

  द यार -ए-नूर देखा तो यक़ी आया। खुदा पर जुर्म ढाने के तरीके बहुत हैं।

शायरी#९

बाँटना है तो शौक़ से बाँट दो,  दरमियाँ रिश्तों की तान बान को। बस पत्थर सी दीवार न बनाओ,  शीशे सी गुंजाइस रहने दो।

शायरी#८

वो अपना काम कर के निकल गया, थोड़ा सा नाम कर के निकल गया। दो चार बाते मोहब्बत की भी की, फिर हमें बदनाम कर के निकल गया। 

शायरी#७

 सर पर बैठाया जिसके हूनर को भी हमने, वो अपने मकसद का तलबगार निकला।

शायरी#६

मुस्कुराते चेहरे से बेहतर है मेरी नाराज़गी, उनकी तरह मैं दिखावे का शौक़ीन नहीं।

शायरी#५

मैं खुश हूँ, इससे वो खुश नहीं जाने क्यों तलाश उन्हें वजह की है।

सावन

चित्र

शायरी#४

दोस्त! कैसे समझता मै उसे, जब सिक्का मैंने पलटा ही नही, (जिंदगी) मै यहाँ इंतज़ार कर रहा हूँ, वो वहां इंतजार कर रही है। (म्रत्यु)

शायरी#3

वह गुजरा दौर था, जब पैरों को मिट्टी और मिट्टी को पैर चूमते थे। यह नया दौर है, यहाँ दो पैर भी मुखोटे पहन के घूमते हैं।।

पलायन

सुनहरी नगरी की ओर, जो बढ़ाये थे कदम, अब भूल बन गये है मेरी, जरूरत के बोझ तले, दब गए है सपने, आज फिर अहसास हुआ, मुझे उस खाली हाथ का। जिन्हें लेकर आया था मैं, बुनने को सपने, थक गए वो पैर, जो खुशी में दौड़े थे, स्वप्न धूमिल हो गए, राह ओझिल हो गयी, लील गयी सब उम्मीद, इस महामारी के दौर में, थक गया हूँ अब, न हो पायेगा। भूखा शरीर, आखिर कितना बोझ ढो पायेगा। दो चार कदम हों तो दौडूं मैं, पूरब का पश्चिम से मिलन, कैसे हो पायेगा। उम्मीद है बस, किसी तरह लौट जाउँ मैं, अपने उस प्यारे गांव में, बैठूंगा फिर कभी, किसी नीम की झाव में, इस बार देखूंगा ख़्वाब, हरियाली के अपने गाँव में, इस बार...

छोटी सी डायरी

उठायी जो मैंने, पुरानी रद्दी में पड़ी, धूल फांकती, एक अजीब सी, गुलाबी पन्नो से भरी, छोटी सी डायरी। ये क्यो? खोल रही है परते, उठा रही है परदे, उन रहस्यों से, जो छुपे थे कही, सिमटे थे एक कोने में, अल्हड़पन की यादें लिए, उस उत्तरपुस्तिका की, पुरानी जिल्द के नीचे। बेतुकी बातों से भरे, अनगिनत पन्ने, दिखा रहे है झलक, उन बेबाक हिस्सों की, शरारत भरे अनेक किस्सों की, खाली पीरियड में खेले, उन बेफजूल के खेल की, कभी जीरो काटा, तो कभी नंबर के मेल की, कभी अध्यापक की शक्ल, तो कभी उनके हस्ताक्षर की नक़्ल, कभी खुद की झुंझलाहट, या दिल में उठी वो पहली आहट, वो जज्बातों की छोटी सी डायरी, लिखी उन पर दीवानों की शायरी, या छुपी जिल्द में वो गुलाब की पत्ती, वो अधूरी मोहब्बत और दोस्ती पक्की, गिना गयी वो ऐसे, सारे राज, लौटा हूँ जैसे, मैं उस लड़कपन से आज।

शायरी#२

मैं रेत के महल बना के खुश था। वो भविष्य का आईना दिखा बैठे।

शायरी#१

माना कि मुश्किल हालात में हूँ, पर खुश हूँ, किसी के जज्बात में हूँ।

जब कोरोना आया था!!

कभी मानव जाति पर, ऐसा वक्त भी आया था। बैठ गयी थी धूल, जिसे ठोकर से उड़ाया था। अपने कर्मो का उसने, शायद फल ये पाया था। बसंत के मौसम में, उसने मुँह अपना छुपाया था। जुबां हो गयी थी बन्द, बस आंखों ने फरमाया था। मानस को देख मानस ने, मुँह अपना पिचकाया था। हवा हो गयी थी साफ, फिर भी खुली सांस न ले पाया था। वुद्धिजीवी ने ही, खुद पर पवंदियाँ को लगाया था। भीड़ देख के आदम की, आदम घबराया था। बड़े कुट रहे थे वो, जिसने भी झुंड बनाया था। खुले उड़ रहे थे वो, जिन्हें पिंजरे में बसाया था। पैर होकर के भी, वो चौखट लांघ न पाया था। निर्मल हो गयी थी नदियां, जिनमें तेजाब मिलाया था। पेड़ों ने भी खुश होकर, अपने सिर को हिलाया था। अब दिख रहा था वो, जो कभी नजर न आया था। उठ गया था परदा, प्रकृति पे जो गिराया था। जिन्हें कोसते रात दिन, उन्होंने फ़र्ज़ अपना निभाया था। क्यो ईश्वर का है रूप दूसरा, डॉक्टर नर्सो ने दिखाया था। खामोश खड़ा था मैं, ज्यादा कुछ न कर पाया था। घर में रहने का शासनादेश, मैंने खूब निभाया था। तुम ऐसे याद करोगें, उस दिन को। जब कोरोना आया था।