छोटी सी डायरी
उठायी जो मैंने,
पुरानी रद्दी में पड़ी,
धूल फांकती,
एक अजीब सी,
गुलाबी पन्नो से भरी,
छोटी सी डायरी।
ये क्यो?
खोल रही है परते,
उठा रही है परदे,
उन रहस्यों से,
जो छुपे थे कही,
सिमटे थे एक कोने में,
अल्हड़पन की यादें लिए,
उस उत्तरपुस्तिका की,
पुरानी जिल्द के नीचे।
बेतुकी बातों से भरे,
अनगिनत पन्ने,
दिखा रहे है झलक,
उन बेबाक हिस्सों की,
शरारत भरे अनेक किस्सों की,
खाली पीरियड में खेले,
उन बेफजूल के खेल की,
कभी जीरो काटा,
तो कभी नंबर के मेल की,
कभी अध्यापक की शक्ल,
तो कभी उनके हस्ताक्षर की नक़्ल,
कभी खुद की झुंझलाहट,
या दिल में उठी वो पहली आहट,
वो जज्बातों की छोटी सी डायरी,
लिखी उन पर दीवानों की शायरी,
या छुपी जिल्द में वो गुलाब की पत्ती,
वो अधूरी मोहब्बत और दोस्ती पक्की,
गिना गयी वो ऐसे,
सारे राज,
लौटा हूँ जैसे,
मैं उस लड़कपन से आज।
पुरानी रद्दी में पड़ी,
धूल फांकती,
एक अजीब सी,
गुलाबी पन्नो से भरी,
छोटी सी डायरी।
ये क्यो?
खोल रही है परते,
उठा रही है परदे,
उन रहस्यों से,
जो छुपे थे कही,
सिमटे थे एक कोने में,
अल्हड़पन की यादें लिए,
उस उत्तरपुस्तिका की,
पुरानी जिल्द के नीचे।
बेतुकी बातों से भरे,
अनगिनत पन्ने,
दिखा रहे है झलक,
उन बेबाक हिस्सों की,
शरारत भरे अनेक किस्सों की,
खाली पीरियड में खेले,
उन बेफजूल के खेल की,
कभी जीरो काटा,
तो कभी नंबर के मेल की,
कभी अध्यापक की शक्ल,
तो कभी उनके हस्ताक्षर की नक़्ल,
कभी खुद की झुंझलाहट,
या दिल में उठी वो पहली आहट,
वो जज्बातों की छोटी सी डायरी,
लिखी उन पर दीवानों की शायरी,
या छुपी जिल्द में वो गुलाब की पत्ती,
वो अधूरी मोहब्बत और दोस्ती पक्की,
गिना गयी वो ऐसे,
सारे राज,
लौटा हूँ जैसे,
मैं उस लड़कपन से आज।
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